Uday Kotak सफलता की कहानी Uday Kotak Success Story in hindi

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Uday Kotak सफलता की कहानी | Uday Kotak Success Story in hindi

हाल ही में उन्होंने आईएनजी वैश्य बैंक को खरीदने की घोषणा की। यह डील पंद्रह हजार करोड़ रु. की होगी। इस डील के बाद उदय कोटक की बैंक देश की चौथी बड़ी बैंक हो जाएगी। किसी समय उदय नौकरी करना चाहते थे, लेकिन पिता से हुई गंभीर चर्चा के बाद उन्होंने इसका इरादा छोड़ दिया।

पाकिस्तान से मुंबई आया कोटक परिवार कपड़े का बड़ा कारोबारी रहा। उस दौर में उनके विदेशों से संबंध थे और उदय के चाचा और धीरूभाई अंबानी में मैत्री रही। चाचा का पोलैंड में ऑफिस था। वे एक्सपोर्ट करते थे, धीरूभाई और वे जब भी पोलैंड जाते थे, साथ ही रहते थे।

परिवार इतना सक्षम था कि उदय का एडमिशन कॉन्वेंट में करा सकता था, चूंकि दादा गांधीवादी थे, इसलिए हिंदी विद्या भवन में कराया गया। बड़ी बात यह भी थी कि स्कूल का उद्घाटन मोरारजी देसाई ने किया था। उदय अव्वल रहे और सिडनेहम कॉलेज में एडमिशन मिला, वहां भी अच्छे पढ़े, पर एक साल ज्यादा लगा।

क्रिकेट और सितार के शौकीन उदय सितंबर 1979 में एक दिन क्रिकेट खेल रहे थे और बॉल सिर में आकर लगी। मैदान पर ही बेहोश। डॉक्टरों ने कहा कि ब्रेन हेमरेज हुआ है। तत्काल ऑपरेशन हुआ। साल भर पढ़ नहीं सके। लेकिन साल भर बाद जब परीक्षा दी तो बॉम्बे यूनिवर्सिटी में टॉपर रहे। फिर अपनी जिद से जमनालाल बजाज कॉलेज से एमबीए किया। मुंबई के फोर्ड इलाके की नवसारी बिल्डिंग में परिवार का पुश्तैनी ऑफिस था।

उदय भी जाने लगे। लेकिन बात नहीं बनी। उदय कॉटन का कारोबार छोड़कर हिंदुस्तान लीवर में नौकरी करना चाहते थे। एक दिन पिता ने उन्हें समझाया कि नौकरी से कुछ हासिल नहीं होगा। तब उदय ने कहा-मैं परिजनों के साथ काम नहीं कर सकता, क्योंकि हर फैसले के लिए इतने बड़े परिवार में हर आदमी की हामी चाहिए रहती है। पिता ने पूछा तुम क्या चाहते हो, उदय बोले-मैं फाइनेंशियल कंसल्टेंसी करूंगा। उसी ऑफिस में उनको 300 वर्ग फीट की जगह दे दी। उन दिनों बैंक जमाकर्ताओं को 6 फीसदी और लोन पर ब्याज 16.5 फीसदी लेती थी।

तभी उनकी मुलाकात टाटा की कंपनी नेल्को का फाइनेंस देखने वाले एक व्यक्ति से हुई। नेल्को बाजार से तब पैसा ले रही थी। इसकी व्यवस्था उदय ने अपने मित्रों से करने को कहा। बात बन गई और नेल्को को उन्होंने पैसा दिया। 1980 में कई विदेशी बैंकों ने भारत में दफ्तर खोले। तब उदय को फाइनेंस जुटाने के और अवसर मिले। 1985 को वे अपने लिए भाग्य का दरवाजा खुलने जैसा मानते हैं। ग्रिंडलैज के सिडनी पिंटो उनके दोस्त और मेंटर दोनों हैं। पिंटो ने उनसे खुद का फाइनेंस कारोबार शुरू करने को कहा।

इसी साल उनकी मुलाकात पल्लवी से हुई, जो जीवनसाथी बनी। इसी साल आनंद महिंद्रा से भी मुलाकात हुई, जिनकी महिंद्रा ऑगीन के लिए उदय ने धन जुटाया। आनंद ने भी उनसे खुद का फाइनेंस कारोबार शुरू करने को कहा और 1986 में उन्होंने आनंद महिंद्रा की मदद से 30 लाख रु. से कंपनी शुरू की। कोटक महिंद्रा की शुरुआत इस तरह से 28 वर्ष पहले हुई।अनिल अंबानी की शादी में उदय की मुलाकात एक दोस्त से हुई, जो एफडी के कारोबार से पिंड छुड़ाना चाह रहा था।

उदय ने उस कारोबार को 50 लाख में ले लिया। दलाल स्ट्रीट में ऑफिस लिया और 5 वर्ष में ही कोटक महिंद्रा मर्चेंट बैंकिंग में भी आ गई। 1991 में ही कंपनी पब्लिक इश्यू ले आई। उदय को कोटक महिंद्रा में से गोल्डमैन साक्स जैसी ध्वनि आती थी। और एक दिन गोल्डमैन साक्स के हेंक पॉलसन के साथ उन्होंने करार कर लिया। इसके बाद से सफलता बदस्तूर जारी है।

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