कैसे एक भिखारी बना करोड़पति | Renuka Aradhya Success Story

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कैसे एक भिखारी बना करोड़पति | Renuka Aradhya Success Story in Hindi

जो बचपन में  भीख माँगा करता था और आज अपनी मेहनत और लगन के दम पर 40 करोड़ की कंपनी का मालिक है. ये कहानी है श्री रेणुका आराध्य (Shree Renuka Aradhya) की, जो ‘Pravasi Cabs Private Limited’ के मालिक है. साथ ही वे 3 start-up के director भी है.

जन्म

रेणुका आराध्य (Renuka Aradhya) का जन्म बेंगलुरू के समीप एनेकाल ताल्लुक के गोपासंद्र गाँव में हुआ. उनके पिता राज्य सरकार द्वारा आबंटित एक छोटे से स्थानीय मंदिर में पुजारी थे. किन्तु इससे उन्हें कोई तयशुदा वित्तीय सहायता प्राप्त नहीं होती थी.

अपने परिवार की गुजर-बसर के लिए वे दान-पुण्य में मिलने वाले पैसों पर निर्भर थे. लेकिन इन पैसों से गुजारा न हो पाने के कारण वे पूजा के उपरांत आस-पास के गांवों में भिक्षा मांगने जाया करते. उनकी मदद के लिए रेणुका भी उनके साथ होते.

भिक्षा में लोग उन्हें चांवल, ज्वार, रागी आदि अनाज दिया करते, जिसमें से घर की आवश्यकता अनुसार कुछ अनाज छोड़ शेष को बाजार में विक्रय कर प्राप्त पैसों से वे अपना घर चलाते थे.

चर्मरोगी की सेवा का काम

उनके परिवार का निर्वाह बड़ी मुश्किल से होता था. धीरे-धीरे परिवार की आर्थिकस्थिति और ख़राब होने लगी.  इसलिए जब रेणुका 6 वीं कक्षा में पहुँचे, तो उनके पिता ने उन्हें एक बुजुर्ग चर्मरोगी व्यक्ति के घर उसकी सेवा-सुश्रुषा के काम में लगा दिया.

रेणुका उस बुजुर्ग को नहलाते-धुलाते, उसके शरीर पर मलहम लगाया करते और उसकी प्रत्येक आवश्यकताओं का ध्यान रखा करते थे. पुजारी परिवार से ताल्लुक रखने के कारण उस घर में पूजा-पाठ की जिम्मेदारी भी उन पर डाल दी गई.

सुबह 10-11 बजे तक अपना काम समाप्त कर वे स्कूल भी जाते और स्कूल से वापस आकर फिर काम में जुट जाते थे. इस दिनचर्या के साथ उन्होंने वहाँ एक वर्ष तक कार्य किया.

चिकपेट के आश्रम में दाखिला

एक वर्ष उपरांत उनके पिता ने उन्हें चिकपेट के एक आश्रम में डाल दिया. आश्रम में उन्हें बस दो वक्त का भोजन मिलता था, एक सुबह 8 बजे और दूसरा रात को 8 बजे. दिन में लम्बे समय तक भूखे रहने के कारण उनका दिमाग किसी तरह भोजन का जुगाड़ करने की सोच में डूबा रहता था और वे पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाते थे.

आश्रम में वेद और संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य था. अपने सीनियर्स को नामकरण, विवाह और अन्य कार्यक्रमों में पूजा-पाठ हेतु जाता देख रेणुका वेद और संस्कृत ध्यान से पढ़ने लगे, ताकि उनके साथ पूजा-पाठ में जा सके और वहाँ जाकर भरपेट भोजन कर सके.

लेकिन इसके लिए उन्हें अपने सीनियर्स की बहुत मनुहार करनी पड़ी और उनके कपड़े धोने का प्रस्ताव रखने के बाद वे रेणुका को अपने साथ ले जाने के लिये राजी हुए. इस तरह उनकी भोजन की समस्या का निराकरण हो गया, लेकिन अधिकांश समय सीनियर्स का काम करते रहने के कारण वे ठीक से पढ़ नहीं पाए.

परिणामस्वरूप 10 वीं कक्षा में वे फेल हो गए. इस बीच उनके पिता का भी स्वर्गवास हो गया. ऐसी परिस्थिति में माँ और भाई-बहनों की जिम्मेदारी उनके कन्धों पर आ गई. अतः पढ़ाई छोड़ वे घर वापस आ गए और काम की तलाश करने लगे.

विभिन्न नौकरियां 

सबसे पहले उन्हें एक mechanical lathe factory में helper का काम मिला. एक वर्ष वहाँ काम करने के उपरांत वे एक plastic बनाने वाली एक कंपनी में काम करने लगे, फिर एक ice making company में.

उसके बाद उन्हें कैमरा कंपनी एडलेब में स्वीपर का काम मिला. दिमाग तेज होने की वजह से उन्होंने वहाँ रहते हुए printing का काम भी सीख लिया. वहाँ वे तीन वर्ष तक कार्य करते रहे. लेकिन वहाँ के कुछ कर्मचारी उन्हें अपने साथ संदिग्ध गतिविधियों में घसीटना चाहते थे, इसलिए उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी.

उसके बाद उन्होंने श्याम सुन्दर ट्रेडिंग कंपनी में काम करना प्रारंभ कर दिया. वह सूटकेस, वैनिटी बैग, एयर बैग आदि बेचने वाली कंपनी थी. रेणुका ने उस कंपनी में भी helper की हैसियत से शुरूवात की, लेकिन अपनी मेहनत और लगन के बलबूते salesman की position तक पहुँच गए. लेकिन वे संतुष्ट नहीं थे.

व्यवसाय में घाटा

वे स्वयं का business शुरू करना चाहते थे. अतः कुछ पूँजी लगाकर उन्होंने सूटकेस और वैनिटी बैग के कवर बनाने का व्यवसाय प्रारंभ किया. वे सुबह-सुबह अपनी साइकिल पर निकल पड़ते और घर-घर जाकर सूटकेस और वैनिटी बैग के कवर सीते. लेकिन उनका ये प्रयास सफल नहीं हो पाया और उनका पूरा पैसा डूब गया. अब वे फिर खाली हाथ हो चुके थे.

ऐसे में उनके बड़े भाई ने उन्हें एक जगह 600 रुपये के वेतन पर security guard के काम पर लगा दिया. इस कार्य को करते हुए ही 20 वर्ष की आयु में रेणुका ने विवाह कर लिया. उनका मानना था कि शादी उन्हें और जिम्मेदार बना देगी.

Security guard के रूप में मिलने वाला वेतन घर चलाने के लिये  पर्याप्त नहीं था. इसलिए रेणुका की पत्नी भी एक गारमेंट फैक्ट्री में काम करने लगी. साथ ही अतिरिक्त आमदनी के लिए रेणुका स्वयं नारियल के पेड़ पर चढ़कर नारियल तोड़ने और उसकी देखभाल करने का काम करने लगे.

ड्राईवर बनने का फैसला 

कुछ बेहतर कर गुजरने की ललक उनमें अब भी कायम थी. इसलिए एक दिन उन्होंने सब कुछ छोड़ Driver बनने का फैसला कर लिया. लेकिन उनकी जेब में न तो licence बनाने के पैसे थे, न ही ड्राइविंग सीखने के. तब उन्होंने अपनी शादी की अंगूठी बेचकर और पत्नि के भाई से कुछ रूपये उधार लेकर licence बनवाने के लिए पैसे जुटाये.

licence बनवाने और ड्राइविंग सीखने के बाद जब उन्हें पहला ड्राइवर का जॉब मिला, तो पहले ही दिन उनके हाथों एक्सीडेंट हो गया और उन्हें नौकरी से बेदखल कर दिया गया. अपने एक अहम फैसले की ये दुर्गति देख वे बेहद निराश हो गए. उन्हें लगने लगा कि अब कोई उन्हें ड्राइवर के काम पर नहीं रखेगा.

लेकिन एक सज्जन व्यक्ति सतीश शेट्टी ने उन पर भरोसा जताया और अपनी ट्रेवल एजेंसी में उन्हें काम दिया. उन्होंने उनमें आत्मविश्वास का संचार भी किया. रेणुका पूरी मेहनत से वहाँ काम करने लगे. वे ठान चुके थे कि वे एक अच्छे ड्राइवर बनकर रहेंगे.

वे अपनी ड्राइविंग पर मेहनत करते, अपने हर customer का पूरा ध्यान रखते और उन्हें अच्छी से अच्छी service देने की कोशिश किया करते. धीरे-धीरे customers का उन पर भरोसा बढ़ता गया. उसके बाद उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी पलटकर नहीं देखा.

Dead body के transportation का काम 

कुछ वर्षों के बाद उन्हें नेहरु ट्रेवल्स में काम करने का अवसर प्राप्त हुआ, जो dead body के transportation के लिए मशहूर था. रेणुका ने इस अवसर को भी हाथों-हाथ लिया.

उनकी सोच थी कि यदि जीवन में आगे बढ़ना है, तो कोई भी अवसर हाथ से जाने मत दो और जो भी काम हाथ में लो, उसे पूरी लगन और निष्ठा से करो. पूरी निष्ठा से उन्होंने यह कार्य किया और 4 साल वहाँ काम करने के दौरान 200-300 dead body का पूरे भारत में transportation किया.

सिटी सफारी’ कंपनी की शुरुआत 

उसके बाद में वे दूसरी ट्रेवल एजेंसी में काम करने लगे, जहाँ उन्हें विदेशी पर्यटकों को tour पर ले जाने का अवसर प्राप्त हुआ. विदेशी पर्यटक उन्हें डॉलर में टिप दिया करते थे.

रेणुका इन पैसों को जमा करने लगे और इन्हीं जमा पैसों से तथा कुछ अपनी पत्नी के पी.एफ. के पैसों से उन्होंने कुछ लोगों को साथ लेकर 2001 में ‘सिटी सफारी’ नाम की कंपनी खोल ली.

यह कंपनी ठीक-ठाक चलने लगी और वे इसके manager बना दिए गए. कोई और होता तो शायद यहाँ आकर संतुष्ट हो जाता, लेकिन रेणुका सपने बड़े थे.

उन्होंने बैंक से लोन लेकर अपनी खुद की इंडिका खरीदी. फिर डेढ़ वर्ष के भीतर अपनी दूसरी गाड़ी भी ले ली. दो वर्षों तक वे स्पॉट सिटी टैक्सी का काम करते रहे. वे धीरे-धीरे अपनी गाड़ियों की संख्या में बढ़ोत्तरी भी करते जा रहे थे.

‘प्रवासी कैब्स प्राइवेट लिमिटेड’ की स्थापना

2006 तक उनके पास 5 गाड़ियाँ हो चुकी थी, जिन्हें वे अपने भाई और अन्य ड्राइवर्स की मदद से चलाते थे. इसी वर्ष एक अवसर ने फिर से उनका दरवाजा खटखटाया. उन्हें यह जानकारी मिली कि ‘इंडियन सिटी टैक्सी’ अपनी कंपनी बेच रही.

अवसर को भांप कर उन्होंने अपनी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा जोखिम उठाते हुए अपनी सारी गाड़ियाँ बेच दी और मार्केट से कुछ उधार लेकर उस कंपनी को खरीद लिया.

उस कंपनी का नाम उन्होंने ‘प्रवासी कैब्स प्राइवेट लिमिटेड’ रखा. यह कदम उनके लिए मील का पत्थर साबित हुआ. इस कदम के साथ ही व्यवसायी के तौर पर उनके एक नए सफ़र का आगाज़ हुआ.

कॉर्पोरेटके लिए काम

नई कंपनी में उन्होंने सिटी टैक्सी का काम पूर्णतः बंद कर दिया और कॉर्पोरेट को अपनी गाड़ी देने लगे. कॉर्पोरेट को गाड़ी देने के कई लाभ थे. एक तो ये उनके लिए एक बड़ा challenge था, फिर इसमें उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला और साथ ही उनकी कंपनी को एक बड़ा exposure मिला.

सबसे पहले उन्होंने Amazon India के लिए काम करना शुरू किया. उस समय उनकी कंपनी में 15 members और 4 गाड़ियाँ थी. Amazon India ने भारत में बहुत तेजी से प्रगति की और साथ ‘प्रवासी कैब्स प्राइवेट लिमिटेड’ ने भी.

कुछ ही वर्षों में उनकी गाड़ियाँ 4 से 300 हो गई. बंगलुरू के बाद उन्होंने उसके चेन्नई में भी अपनी branch शुरू कर दी. वहाँ उनकी 275 गाड़ियां चलती है.

शुरू में वे Amazon  India से ही जुड़े रहे. लेकिन बाद में उन्होंने अपनी कंपनी के काम का expansion प्रारंभ किया. जिसमें कई नामी गिरामी companies जैसे Google, Walmart, C-gates, General Motors आदि उनकी client बनी.

उनकी कंपनी अपने ग्राहकों के समय, संतुष्टि और आराम का पूरा ध्यान रखती है, ताकि उनका विश्वास बनाये रख सके. इसलिए आज उनकी कंपनी का इतना मजबूत customer base है कि जहाँ कई कम्पनियाँ Ola और Uber जैसी नई कंपनियों के मार्केट में आने के बाद धराशायी हो गई, वहीँ ‘प्रवासी कैब्स प्राइवेट लिमिटेड’ मजबूती से आगे बढ़ती रही.

आज उनकी कंपनी में 1000 लोग काम करते है और उसका टर्न ओवर 40 करोड़ का है. साथ ही वे 3 start-up के director भी है.

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