समोसे बेचने के लिए छोड़ दी गूगल की नौकरी, टर्नओवर 50 लाख से ज्यादा

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समोसे बेचने के लिए छोड़ दी गूगल की नौकरी टर्नओवर 50 लाख से ज्यादा

मुनफ कपाड़िया को साल 2014 की वह दोपहर अच्छे से याद है जब उनका अपनी मां के साथ झगड़ा हो गया था, उस झगड़े ने मुनफ और उनकी मां दोनों की ज़िंदगी बदल दी.

दरअसल उस समय गूगल में काम करने वाले 25 साल के मुनफ टीवी पर अपना पसंदीदा अमरीकी कार्टून शो ‘द सिम्पसंस’ देखना चाहते थे जबकि उनकी मां को भारतीय टीवी शो देखना था.उनकी मां ने चैनल बदल कर अपना पसंदीदा कार्यक्रम लगा दिया. इस वजह से दोनों के बीच बहस हो गई.लेकिन इस बहस ने एक बेहतरीन आइडिया को जन्म दिया. जिसकी मदद से मुनफ आज एक शानदार पॉप-अप रेस्टॉरेंट चला रहे हैं, जिसकी हेड शेफ खुद उनकी मां हैं.

मां के हुनर को तराशा

मुनफ ने सोचा कि उनकी मां के अंदर खाना बनाने का बेहतरीन हुनर है, लेकिन वे सिर्फ टीवी देखकर उसे बर्बाद कर रही हैं.मुनफ की मां नफीसा बहुत ही स्वादिष्ट ‘बोहरी’ खाना बनाती हैं, इस भारतीय डिश का मुंबई में मिलना बहुत ही मुश्किल है.

मुनफ ने अपने 50 दोस्तों को घर पर लंच के लिए बुलाया. वे याद करते हुए बताते हैं, “मेरे आठ दोस्त लंच पर घर आए, मैंने उन्हें अपनी मां के हाथों से बना परोसा.”वे बताते हैं, “हम हर शनिवार-रविवार को यह करने लगे, धीरे-धीरे दूसरे लोगों को भी रेस्टॉरेंट की दर पर खाना बेचने लगे. इस तरह बोहरी किचन का जन्म हुआ.”

‘ग्राहकों ने मां को गले लगा लिया’

आमतौर पर बोहरी पकवान दाऊदी बोहरा समुदाय के बीच काफी प्रचलित है. यह भारत और पाकिस्तान में रहने वाला एक छोटा सा मुस्लिम समुदाय है.

पॉप-अप लंच के पहले ऑर्डर में मुनफ ने पारंपरिक खाने के लिए प्रति व्यक्ति 700 रुपये का दाम रखावो बताते हैं कि खाना खाने के बाद ग्राहकों ने उनकी मां को गले लगा लिया और कहा, “आंटी आपके हाथों में तो जादू है.”

मुनफ उस वक्त को याद करते हुए बताते हैं, “मैं अपनी मां की आंखों में खुशी देख सकता था, पहली बार किसी ने उनके खाने की इस तरह तारीफ़ की थी.”

गूगल की नौकरी छोड़ी

मुनफ ने खाने के बिजनेस में उतरने का फैसला कर लिया. उन्होंने सोच लिया कि यह फायदे का सौदा होने वाला है.उन्होंने जनवरी 2015 में गूगल में अपनी नौकरी छोड़कर ‘द बोहरी किचन’ की शुरुआत कर दी.

जल्दी ही लोगों की ज़बान पर बोहरी किचन का स्वाद चढ़ने लगा. मुनफ अब प्रति भोज 1500 रुपये तक चार्ज करते हैं. इसमें मुख्य रूप से लंच और कभी-कभी डिनर शामिल रहता है.इसके अलावा उन्होंने अलग से केटरिंग बिजनेस भी शुरू कर दिया है, जिसे वे साप्ताहिक तौर पर देखते हैं. इसके लिए उन्होंने तीन लोगों को काम पर रखा है.

बिजनेस की चुनौतियां

मुनफ का यह बिजनेस लगातार सफल हो रहा है और अब वे देश के दूसरे हिस्सों में भी आउटलेट खोलना चाहते हैं.हालांकि मुनफ बताते हैं कि यह सब इतना आसान भी नहीं रहा, सबसे मुश्किल काम था अनजान लोगों को अपने घर में बुलाना और उनकी मेहमाननवाज़ी करना.

मुनफ बताते हैं कि इसके लिए उन्होंने ‘नो सीरियल किलर पॉलिसी’ अपनाई, यानी अगर कोई ग्राहक सीट बुक करना चाहता है तो पहले उसे हमें बताना पड़ेगा. फिर हम उनसे कुछ सवाल-जवाब कर उनके बारे में जानकारी जुटाते हैं.दूसरी चुनौती थी अपने घरवालों को यह समझाना कि गूगल की नौकरी छोड़कर खाने का बिजनेस शुरू करना फायदेमंद रहेगा.और इसके बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी अपने ग्राहकों के लिए खाने की गुणवत्ता और स्वाद को बरकरार रखना.

टेक्नोपेक एडवाइजर्स के प्रबंधक सलाहकार रविंद्र यादव बताते हैं कि खाने से जुड़े बिजनेस में सबसे बड़ी समस्या वफादार ग्राहकों को जुटाना होता है.वो कहते हैं, “आज के समय में लोगों के पास खाने के कई विकल्प मौजूद हैं, ऐसे में यह समझना कि आपका ग्राहक क्या खाना पसंद करेगा और उसकी पंसद के मुताबिक ही अलग चीज बनाना एक बड़ी चुनौती है.”

‘खाना बनाते हुए देखती हूं टीवी’

पिछले कुछ दशकों में भारत में खाने से जुड़े बिजनेस में काफी उछाल आया है. लोगों में खर्च करने की क्षमता बढ़ी है और वो अच्छा खाने के लिए पैसे खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं.

मुनफ की मां कहती हैं, “मैंने खाना बनाने को कभी भी बिजनेस की तरह नहीं देखा, यह करने में तो मुझे मज़ा आता है. जब मेरे मेहमान कहते हैं कि मेरे हाथों का बना खाना खाकर उन्हें अपने घर की याद आ गई तो मेरे लिए यह सबसे बड़ी खुशी होती है.”

लेकिन क्या आपके बेटे ने आपकी टीवी देखने की आदत छुड़वा दी है?इस सवाल पर वे खिलखिलाकर हंसने लगती हैं और कहती हैं, “मैं अभी भी खाना बनाते हुए अपने पसंदीदा टीवी शो देखती रहती हूं.”

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