अब जाकर समझ आया! ‘अम्मी’ जैसी हैं, वैसी क्यों हैं

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बच्चे को मां की गोद में जो इल्म मिलता है, वो दुनिया में कहीं नहीं मिलता. बच्चे की ज़िद, गुस्सा उसके रोने -खेलने के हर लम्हे को मां जीती है. मां उसके आधे-अधूरे अक्षरों से शब्द, और शब्दों से किस्से बनाती है. बच्चा सबसे ज्यादा मां के ही साथ रहता है तो उनसे लड़ने-झगड़ने, शिकायत-शिकवे करने में सहज रहता है.

बिछौना संवारने से दफ्तर का बैग पकड़ाने के बीच मां को बच्चे से और बच्चे को मां से सैकड़ों शिकायतें होती हैं. बच्चा अगर लड़की हो तो मां की शिकायतें, उनका ज्ञान थोड़ा और बड़ जाता है. बेशक ये कहकर मन को तसल्ली दे सकते हैं. ज्ञान उसे ही ज्यादा दिया जाता है, जो ज्यादा जिम्मेदार होता है. मां छोटी-छोटी बात पर टोकती तो झुंझलाहट होती थी. पर अब उनकी उन्ही खून खौल जाने वाली बातों पर गौर करती हूं तो दुलारने को जी चाहता है.

कॉलेज से घर लौटने में 10-15 मिनट भी लेट हो जाने पर उनका फोन आता, कहां हो? आई नहीं अभी तक. क़सम से आग लग जाती थी. मन ही मन बोलती थी, नहीं मरी बाबा, आ रही हूं. हो जाता है थोड़ा बहुत आगे-पीछे. मशीन नहीं हूं जो सटीक टाइम पर सब कर दूं. बेटों से तो कभी नहीं पूछती. चाहें 5 घंटे देर से आए. मुझसे ही क्यों सवाल किए जाते हैं.

पर अब, जब दफ्तर से लौटते हुए भीड़ वाली मैट्रो से झुंझलाहट के साथ बाहर निकलती हूं. जरा भी देर होने पर उनका फोन आता है. तो स्क्रीन पर उनका नाम फ्लैश होते देख गुस्सा नहीं आता. महसूस होता है, कितनी फिक्र है. टकटकी लगाए घड़ी देखती ही रहती हैं क्या ? कब आऊंगी घर. उनकी दुनिया हमारे घर से निकलने से लेकर वापस लौटने पर ही पूरी हो जाती है. बच्चा वक्त पर घर ना आए तो मां के मन में बुरे ख्याल आते हैं. मां भोली हैं न, डर जाती है. अब मैं बखूबी समझती हूं उन्हें हालात से लड़ना नहीं सिखाया गया. उन्हें बताया गया, जमाना बुरा है तो घर में रहो.

जब-जब मैंने कहा रोज़ के रूटीन से थक गई हूं. कुछ अलग करती हुं. छुट्टी में घूम आती हूं. उनका जवाब होता, थक गई हो तो घर में आराम कर लो. रोज़ बाहर (ऑफिस) ही तो जाती हो. घर का काम कर लो, खाना बना लो, अलग हो जाएगा. मैं सर पकड़ लेती थी. या ख़ुदा मैं क्या करूं, जैसा रिएक्शन होता था. कसमसा के रह जाती थी.

अब समझ आता है, कुछ अलग करने के नाम पर मां को ‘तरह तरह के पकवान पकाना सीख जाऊं’. ‘कपड़े टेलर को देने के बजाय खुद सिल लूं’. ‘घर की सफाई कर लूं’. जैसे काम सिर्फ मेरे लिए क्यों सूझते. क्योंकि उनकी खुद की दुनिया इन्ही कामों के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है. उनके बनाए खाने से परिवार खुश तो वह कामयाब हो गईं. उन्हें नहीं पता दफ्तर जाने का मतलब बाहर जाना नहीं होता. वहां हम काम करने जाते हैं, घूमने नहीं. परिवार का ख्याल रखने के अलावा खुद के लिए भी जीना क्या होता है. मां को नहीं मालूम.

कब सीखोगी आखिर तुम घर का काम ? इतनी बड़ी हो गई हो. किसी के घर जाकर हमारी बेइज्जती मत करवाना. घर का काम कर लेना. अभी से करोगी तो आदत पड़ जाएगी. क्या सोचेंगे वो लोग. ये वाले डायलॉग्स सुन सुनकर तो मेरा दिमाग सुन्न पड़ चुका था.

घर का काम नहीं आता, क्या सोचेंगे वो लोग. अब इस बात पर मेरे मन में सवाल आता है. जब भाई की शादी हो रही थी, तब मां ने उससे एक बार भी नहीं कहा था. अपना कमरा समेटना सीख जा. क्या सोचेगी बहू? कैसा फूहड़ लड़का है. खाना खाकर हॉट-पॉट (रोटी रखने का बर्तन) भी बंद नहीं होता. काम से आते ही खाने के लिए चाहिए. खाना खाते ही पैर फैला के सोने चल दो. मां ने भाई को ये सब नहीं समझाया. मुझे पूरा यकीन है ना ही उसकी मां ने अपने बेटे को समझाया होगा, जिस घर जाने के नाम पर मुझे रोज सुनाया जाता है. क्योंकि ये बदलाव आने में पीढ़ियां लगेंगी. मैं समझती हूं, मर्दों को ये सब समझना-समझाना बकवास लग रहा होगा. पर जिस दिन वो समझेंगे उसी दिन से बदलाव आएगा.

मां को लगता है लड़की ने झाड़ू-पोछा नहीं लगाया, कपड़े नहीं धोए, खाना नहीं पकाया तो वो निकम्मी है. वो बेटे तरह दफ्तर जाती है, पैसा कमाती है. उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि ये उस लड़की की अपनी चॉइस है. दुनिया के लिए वो लायक तब कहलाएगी जब घर संभालेगी. मां की समझ यहीं तक है.

किसी समय सीधे-साधे पूरे कपड़े नहीं पहनती. कभी बाल नहीं बंधते. बंधेंगे तो दो चोटी बन जाएंगी बच्चो की तरह. पजामा-टी शर्ट पहनकर घूमेगी सारे दिन दूसरे के घर जाकर. कभी सलवार कमीज पहन लिया कर. ये बातें पढ़ने में फनी लग सकती हैं. जब आपसे बार-बार सुबह शाम यही सब बोला जाए तो झुंझलाहट होती है. एक समय के बाद चिढ़ होती है, लगता है चुप हो जाओ यार. जीने दो. मन मर्जी के ना सही, पर कम से कम वो  कपड़े  तो पहन ही सकती हूं जिसमें आराम मिले. मेरे बाल, खोलूं या दो चोटी बनाऊं तुम्हे क्या. तुमको जिसमें आराम मिलता है, वो करो. मुझे भी करने दो.

गौर करती हूं तो लगता है. ‘आराम’, क्या है ? मां को नहीं मालूम. उन्होंने अपना आराम उसमें ढूंढा जो उनपर लाद दिया गया. जिसमें उन्हें उलझन हुई उसे उतारकर नहीं फेंका. कुछ नया उन्होंने लोगों के डर से नहीं किया. वो तो सोती-जागती भी औरों की सुविधा के मुताबिक हैं. मां ये सारी कुर्बानियां सिर्फ इसलिए देती हैं क्योंकि वो भोली हैं. मासूम हैं. अपनी ज़िंदगी पर अपना हक़ नहीं जताती. अगर मैं वैसी नहीं हुं तो उसमें कुछ भी गलत नहीं है.

सुबह उठने के वक्त से लेकर बिस्तर लगाने तक. जितनी बातों पर टोका जाता है. अब एक-एक बात पर तसल्ली से गौर करती हूं तो सच में सिर्फ ये दिखता है कि वो मासूम हैं.

बस आखिर में यही कहना चाहती हूं, हमें परिवार से शिकायत होती है, उनसे लड़ते-झगड़ते हैं. हम रोते हैं, हंसते हैं. पर वही चीजें हमें हमेशा के लिए बदल देती हैं. हम उस बदलाव के गवाह होते हैं. एक वक्त के बाद लगता है सब बीता हुआ कल है और हम अपने रास्ते खुद बनाते हैं. नई राहों पर हमारे लिए बीता कल मायने नहीं रखता. अपने अंदर आए बदलावों के बाद उसी परिवार के साथ होते हैं जिनसे हमें अनगिनत शिकायतें थीं. अहसास होता है, सभी की ज़िंदगी में उथल पुथल होती है, रायता फैलता है. हर कोई खुद ही उससे निपटता है. हमारे अलावा कोई हमें नहीं बदल सकता. यही ज़िंदगी है.

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Ravi Bhosale

मेरा नाम रवि भोसले है और यह एक हिंदी ब्लॉग है जिसमे आपको दुनिया भर की बहुत सारी जानकारी मिलेगी जैसे की Motivational स्टोरी, SEO, Startup,Technology, सोशल मीडिया etc. अगर आपको मेरे/साईट के बारे में और भी बहुत कुछ जानना है तो आप मेरे About us page पर आ सकते हो.

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